Thursday, November 24, 2016

सावन की पहली बूंद

कुंज-वीथियों, उपवनों मे चारों ओर था सन्नाटा,
उदासीन थे समस्त तरुणगण से लेकर खेत-खाहिलन तक,
राह देख रहे थे सावन की पहली बूंद की,

प्यासी थी धरती माँ,
बिलख रहे थे मोती भी समुद्र में,
राह देख रहे थे सावन की पहली बूंद की,

सूख चुका था मेरे उपवन का सरोवर,
आँसू थे उन नन्ही कलियों की आँखों में,
राह देख रही थी वे भी सावन की पहली बूंद की,

आई सावन की पहली बूँद,
प्रफुल्लित हो उठी कलियाँ,
आगमन हुआ लाल पुष्पों का,

आई सावन की पहली बूँद,
सपने संजोने लगी मैं,
मन आंनद से नाच उठा मेरा,

समर्पित करूँगी राजा को लाल पुष्प,
लूँगी मुहमाँगी कीमत,
सौगात है यही सावन की पहली बूँद की ,

पूछने लगी तितली हज़ारों सवाल मुझसे,
क्यों लगा रहा है बोली ? यही तो लाए खुशियाँ,
जलज सरोवर खिल उठते,तरु दल नाच उठते इनसे,

सावन की वे पहली बूँदें भी बोल उठी,
मत लगा इनकी बोली, खुद प्रभु आए द्वार तेरे,
अर्पित कर पुष्पों को उनके चरणों मे,

वट-वृक्ष के सघन कुंजों से पंछी भी बोल उठे,
पवन की लहरे भी बोल उठी,

यही तो यह सच्ची सौगात है सावन की पहली बूँद की ,

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