खूब लड़ी मरदानी, वह थी झाँसी वाली रानी,
पर तू तो है, उन हज़ारों माँओं की लाड्डो रानी ।
डटी रही तू उस रणभूमि में, बिना किसी स्वार्थ के,
कम ना हुआ लाड्डो तेरा साहस , रखी
लाज तूने माँ की कोख की ।
आंतकवाद के चुंगल में तिमिर हो रहा है सारा जग,
वक्त आने पर हो जाते सब दूर ,
फिर क्यों करते है झूठे वादे इस जग से ?
हृदय काँप उठता है उनका,
जब दिलों के टुकड़े ओझल होते उनसे ।
बहुत रोका था तुझको लाड्डो, मत जा बाहर इस बागिया से
पर तू तो ना रूकी माँ की अश्रु -राशियों से ।
पुकार रही थी तुझे तो, धरती माँ अपनी कोख में,
कोई तो बताए उन्हें,
कौन है देशभक्त और कौन है देशद्रोही ?

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