खिलौनेवाला !!!
खिलौनेवाला…………. लाया हूँ माटी के रंग-बिरगे खिलौने,
सुन उसकी स्नेहभिसिक्त आवाज़ दौड़ पड़े बच्चे,
मच गई हलचल सबके घरों में,
करते बूढ़े-जवान भी उसकी पेटी खुलने का इंतजार,
पैसे लाकर करते बच्चे मोल-भाव,
दे जाता एक-एक अन्ने में बच्चों को खिलौने,
क्यों दे जाता है बच्चों को खिलौने एक-एक
अन्ने में,
करने लगी मैं उसकी नियत पर शक, कही बहला-फुसला कर
न ले अपहरण,
बैचन रहने लगा मन मेरा, समझ न पाई मैं उसे,
अभी तो सांझ भी न हुई, कानों में गुंजने लगी वही
आवाज़....
खिलौनेवाला!!!
खिलौनेवाला…………. लाया हूँ माटी के रंग-बिरगे खिलौने,
पर आज न थी मृदुलता उस आवाज़ में, था वह स्वर क्षीण,
क्यों...क्या हुआ....
पूछ बैठी उसकी इस खमोशी का कारण,
संशय और विस्मय भावों से देखा उसने मुझे,
था उसका भी हँसता-खेलता परिवार ,
थी उसकी भी परी,
सम्पन्न हुआ अग्निकुंड के समक्ष शास्त्रज्ञ विद्वान
से विवाह उसका,
दिया उसका हाथ होनहार वर के हाथ में,
स्नेह और वात्सल्य दिया उपहार भेंट स्वरूप,
जीवन दूभर हो गया उसकी परी का,
प्रताड़ित हुई उसकी लाड़ली बिटिया, यातनाएं दी उसे,
दहेज के लोभियों ने ले ली उसकी जान,
वर और कन्या दोनों की दी शिक्षा-दीक्षा एक जैसी
,
तो फिर दहेज की मांग क्यों ?
क्यों उठाया जाता है कन्यापक्ष की मजबूरी का नाजायज
फायदा?
चकनाचूर हो गया माँ का दिल, छोड़ गई इस निर्दयी
संसार को,
ढूंढता हूँ झलक अपनी परी की इन नन्हें-मुन्नों की
किलकारियों में,
चेहरे पर उदासीनता, आवाज़ में दर्द,
भर आईआँखे मेरी, क्यों न समझ पाई उसका दर्द,
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खिलौनेवाला !!! |

