Monday, June 8, 2020

घोर कलयुग


क्या यही है शुरुआत घोर कलयुग की?
हैवानियत की हदें हो रही पार,
कैसे है हम  जिन्दा मानवता की हत्या के युग में ?
लांघ चुका है मनुष्य अपने नैतिक पतन की सीमाओं को….

और कितने जघन्य अपराध करेंगे तू,
एक बार फिर चढ़ी बलि मासूम की,
अमानवीय महाशर्मनाक घटना मल्लपुरम में,
निःशब्द हूँ मैं इस घटना के बाद,

मूक प्राणी के प्रति मानव का व्यवहार कितना व्यवहारिक है?
सच ही है मनुष्य इस धरती का सबसे क्रूर और स्वार्थी प्राणी है,
हे निर्दयी इन्सान!! तुझसे तो बेहतर है वे आदिवासी
अपनी जान पर खेल कर बचाता है मूक प्राणियों  को…….

हे मूर्ख!! आज कोरोना के रूप सिर पर मौत तांडव कर रही है,
फिर भी तू अमानवीय हरकतों से बाज नही रहा,
आत्मघाती साबित हो है सारी दुनिया,
वैज्ञानिक,वैचारिक,सामाजिक और आर्थिक क्रांति से गुजर रहा है जमाना……

क्या कसूर था उस माँ  हथिनी का
मल्लपुरम में खाने की तलाश में निकली थी वह माँ,
अनन्नास में पटाखे भरकर हथिनी को खिला दिया कुछ शरारती तत्वों ने
मुँह और जीभ बुरी तरह चोटिल हो गए उस अबला का,

कुछ खा नहीं पा रही थी ज़ख्मों की वजह से वह,
सड़कों पर भटकती रही अपने बच्चे की भूख की तड़प से बैचेन थी माँ
अरे निर्मोही!! फिर भी तुझको नुक़सान नहीं पहुँचाया उस माँ  ने,
वह तो तड़पती रही अपने गर्भ में पल रहे मासूम के लिए…..

नदी में तीन दिन तक पानी में मुंह डाले खड़ी रही वह माँ.
इस चाहत में  कि अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को बचा ले,
पर लोगों ने इस घटना को सांप्रदायिक देना शुरू कर दिया,
आखिर तब तक मासूमों को बलि चढ़ेगी क्या यही है शुरुआत घोर कलयुग की?


Sunday, March 15, 2020

अनु!!



अनु!! तू तो है बहार उस उपवन की,
महकती कुंज वीथियाँ भी तेरी मुस्कान से  वहाँ की,
खुशबू है तू शीत प्रचंड में खिले पुष्पों की,
गूँज है तू उपवन के तरुणगण  गुलदस्ते की…..

अनु!! तू तो है वह परी,
थामे जिसका भी हाथ नहीं छोड़ती उसका साथ ,
निभाती हर रिश्तो को बखूबी से  सबके साथ,         ,
खिल उठती  जिंदगी जब होता तेरा साथ…..

अनु!! तो नाम है उस संगी का,
आँसूओं को नूर में बदल दे वह,
हर विपत्ति में साथ दे वह,
ऐसी कली है वह,


अनु!! तो नाम है उस मधुर संगीत का,
मेंघों-सी धीर ध्वनि है उसकी,
आनंद की प्रभा झलकती मुख पर उसके,
अमृत टपकता नयनों से उसके,

अनु!! तो है वह अनमोल रत्न,
कितनी बार टूटा दिल उसका पनघट पर,
कोशिश की डूबाने की उसकी किश्ती को तट पर,
हार नहीं मानी उसने,चलती रही लहरों पर...

अनु!! तो है उस उपवन की मल्लिका,
क्या कहू  तुझे गुलबहार,छूईमुई या रात की रानी,
लाख कोशिश कर ले पतझर,
तुझे महकाने से रोक न पायेगा कोई.......