Tuesday, November 22, 2016

नन्ही परी



'माँ मुझे बचा लो,माँ!! पर किसी ने न सुनी उसकी,
फिर से एक भ्रूण हत्या, क्या  दोष था उस नन्ही परी का,
उसने तो कदम भी ना रखा था, इस निर्दयी दुनिया में,

कर रहा है तू, घड़ल्ले से कोख में उस नन्ही परी की हत्या,
क्यों भूल जाता है तू,
सृष्टि की उपज है वह, दुर्गा माँ का अवतार है वह,

कर रहा है तू, उस नन्ही परी का अपमान,
क्यों भूल जाता है तू,
खुशियों की सौगत लाती है वह, प्यार की मूरत है वह,

करता है तू दहेज़ के डर से हत्या जैसा घ्रणित और निकृष्ट काम,
क्यों भूल जाता है तू,
तेरा ही साया है वह, गुमान है तेरा वह,

क्यों भूल जाता है तू,
गुंजता है तेरा आंगन उसकी किलकारियों से,
वेद- पुराण भी अधूरे है बिन उसकी गाथाओं से,

नही है पराया धन वह, नहीं है मोहताज़ किसी पर वह,
बदलनी होगी तुझे सोच समाज की, मत कर खत्मा अपने वंश का,
ले प्रण, अब और नही होंगी कुर्बान कोई नन्ही परी!!

1 comment:

Anonymous said...

Very nice poem teacher! :)