सूर्योदय
का आगमन, हरी-हरी
दूब पर ओस की बूँदे, सफेद
मोतियों जैसी,
चाय
की चुस्की और साथ में अखबार,
वाह !
यह
क्या, सुर्खियों
में नवविवाहित
मच्छरों का जोड़ा,
अभी
दो दिन पहले ही तो हुई थी उनकी शादी,
दिल हो गया बैचन मेरा, तुंरत जा पहुँची मुलाकत करने उनसे l
डरे- सहमे खड़े थे कटघरे में वे नवविवाहित मच्छरों का जोड़ा,
क्यों दी जा रही है सज़ा हमें, पूछा मादा
मच्छर ने, क्या दोष है हमारा ?
इल्ज़ाम पर इल्ज़ाम लगा रही थी मानवजाति उन पर,
सब्र
टूट गया
उसका, बौछार
कर दी उसने भी प्रश्नों
की l
सालों
तक रियाज करा
लोरियाँ गाने
का अपने पूर्वजों के साथ,
तुम
तो न सीख पाए अपने पूर्वजों की परंपराओं को l
जश्न
में चला कर गोलियाँ बहते हो खून बेकसूरों का,
हम
तो एक बूंद से ही हो
जाते है संतुष्ट
l
बनाते
हो मस्कीटो स्प्रे, मिटाने
के लिये अस्तित्व हमारा,
अरे मूर्ख! क्यों कर है
पर्यावरण को दूषित l
विज्ञापन
में दिखाते हो हमारी डरावनी शक्लें,
तू
भी देख ले एक बार आइने में
l
मीडिया
ने नाम दिया हमे खूंखार आतंकवादी का,
पर
गंदी राजनीति पर क्यों नही खोलता तू
मुँह अपना
l
बढ़ती जनसंख्या पर नहीं रख सकते
तुम अंकुश,
तो किसने हक
दिया तुम्हें हमारी जान लेने का
l
फैल
रहे प्रदूषण को
रोकने के लिये खेलते
हो ऑड- ईवन का
खेल,
हम
तो खेलते होली गंदगी से तुझे बचाने के लिये l
मत करो मजबूर हमें मुँह खोलने पर,
जवाब
नही था किसी के पास उसके प्रश्नों का,
धारण
कर लिया सबने मौन व्रत,
तभी
नन्हा-सा मच्छर बोल उठा ‘उलटा
चोर को कोतवाल डांटे’
l

No comments:
Post a Comment