समाज व परिवार की धरोहर है बेटियाँ,
सृष्टि की उत्पत्ति है बेटियाँ,
रिश्तों को प्यार में बाँधती है बेटियाँ
रिश्तों को प्यार में बाँधती है बेटियाँ
सुख-समृद्धि- का नाम है बेटियाँ,
दिया नाम उन्हें ‘लक्ष्मी’
का
पर आज भी परिवारों में बेटियों
के जन्म पर मायूसी छा जाती है,क्यों?
समझा जाता है उन्हें बोझ, क्यो?
कन्या भ्रूण हत्या जैसे घृणित
अपराध थमने का नाम नहीं ले रहा,क्यों?
पराया धन कहते हो बेटी को आज
भी,क्यों?
है वह तो बल दुर्गा और काली
का,
कौन है जिम्मेदार इन सामाजिक
कुरीतियों का….
कौन है जिम्मेदार इन दकियानूसी
प्रथाओं का…
क्या जिम्मेदार,है सिर्फ पुरुष
प्रधान समाज,
नहीं, बिल्कुल नहीं….. जिम्मेदार
है समाज उसकी मानसिकता सोच और अज्ञानता,

सुन एक पिता की जुबानी…. क्या
मायने रखती है बेटी उसकी जिंदगी में …….
आने वाला सुनहरा कल है बेटियाँ,
नयनों की ज्योति है बेटियाँ,
गुरूर है मेरा, आत्मविश्वास का नाम
है बेटियाँ,
वतन का उत्थान है बेटियाँ,
वतन का उत्थान है बेटियाँ,
सपनों की अंतरज्योति है बेटियाँ,
ममता की छाँव है बेटियाँ,
ममता की छाँव है बेटियाँ,
पिता की हर बांधा को हरती है
बेटियाँ,
मायके की परछाई है बेटियाँ,
ससुराल की आन-बान है बेटियाँ,
ससुराल की आन-बान है बेटियाँ,
चाँद सी गुड़िया… तू ही है
मेरा अभिमान,
तू ही है निश्छल मन की मूरत,
बेशकीमती हीरा है तू मेरे सूने
आंगन का,
बिटिया…… तू है मेरे कुल का
दीपक……
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